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ब्रजभाषा में रचित तुलसीदास एवं सूरदास की रामकाव्य परंपरा का विश्लेषणात्मक अध्ययन
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Dr. Geeta Dubey Assistant professor Department of Hindi Maharaja Agrasen Himalayan Garhwal University, Uttarakhand

Abstract

भारतीय संस्कृति और साहित्य में राम का स्थान अत्यंत विशिष्ट और लोकमान्य रहा है। राम एवं उनकी कथा प्रत्येक युग और परिस्थितियों के अनुरूप विविध रूपों में अवतरित होकर सतत प्रासंगिक बनी रही है। ‘रमयते कण-कणे इति राम’ की अवधारणा इस तथ्य को पुष्ट करती है कि राम का स्वरूप भारतीय जनमानस के कण-कण में समाहित है। वे उच्चतम मानवीय मूल्यों एवं आदर्शों के प्रतीक हैं।

भारत की विविध भाषाओं और लोकभाषाओं में श्रीराम को सामाजिक नेतृत्व के प्रतीक के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। समग्र साहित्य एवं इतिहास में राम एक ऐसे नायक हैं जिनका चरित्र गान उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम भारत के प्रत्येक क्षेत्र में भावनात्मक रूप से समाविष्ट है।

भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति में विष्णु के अवतारों में दो अवतार प्रमुख रूप से जनमानस के समक्ष विद्यमान हैं—राम और कृष्ण। कृष्ण जहाँ लोकरंजन के रूप में प्रतिष्ठित हैं, वहीं उनके चरित्र में चातुर्य और अद्वितीयता की झलक मिलती है। राम लोकगण के आदर्श पुरुषोत्तम हैं जिनके उदात्त चरित्र, शील, शौर्य एवं सौंदर्य के कारण उनका व्यक्तित्व अत्यंत ग्राह्य एवं आत्मसात योग्य बनता है।

राम के इस आदर्श चरित्र एवं शील का अत्यंत प्रभावशाली निरूपण गोस्वामी तुलसीदास ने अपने काव्य में किया है, जो जनमानस में स्थायी स्थान रखता है।

गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित यह दोहा—

जो संपत्ति सिरा नहि दीन्ह दसमाथ। सो इसंपदा भीषन हसि कुच दीन्ह रघुनाथ।”

(श्रीरामचरितमानस, पृष्ठ 655)



Published On :
2025-12-31

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