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भारतीय समाज के आधुनिकीकरण में आर्य समाज का योगदान: एक समाजशास्त्रीय अध्ययन

Author: स्वर्णलता रानी, समाजशास्त्र विभाग की शोधार्थी, वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय, आरा, बिहार, भारत

Published On: 2018-04-30

Abstract

उन्नीसवीं शताब्दी का भारतीय समाज सामाजिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक रूढ़ियों, जातिगत असमानता, स्त्री-शिक्षा के अभाव, बाल-विवाह, सती प्रथा, विधवाओं की दुर्दशा तथा अंधविश्वासों से गहरे रूप में प्रभावित था। औपनिवेशिक शासन के इस संक्रमण-काल में स्वामी दयानन्द सरस्वती (1824-1883) द्वारा 10 अप्रैल 1875 को बम्बई में स्थापित आर्य समाज ने वैदिक सिद्धांतों के आधार पर सामाजिक, शैक्षिक एवं धार्मिक सुधारों का एक व्यापक आंदोलन प्रारम्भ किया। आर्य समाज ने शिक्षा के प्रसार, स्त्री-शिक्षा एवं महिला सशक्तिकरण, जातिगत समानता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, सामाजिक न्याय, अस्पृश्यता-निवारण तथा राष्ट्रीय चेतना के विकास के माध्यम से भारतीय समाज के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण गति प्रदान की। प्रस्तुत शोध लेख का उद्देश्य समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से यह विश्लेषण करना है कि आर्य समाज ने आधुनिक भारतीय समाज के निर्माण में किस प्रकार योगदान दिया, तथा इस प्रक्रिया में महिलाओं के ऐतिहासिक संघर्षों एवं प्रतिरोध की क्या भूमिका रही। अध्ययन मुख्यतः द्वितीयक स्रोतों — ऐतिहासिक दस्तावेज़ों, समाजशास्त्रीय साहित्य तथा अभिलेखीय सामग्री — पर आधारित है तथा संरचनात्मक-कार्यात्मक दृष्टिकोण, संघर्ष सिद्धांत तथा आधुनिकीकरण सिद्धांत के आलोक में आर्य समाज के योगदान एवं उसकी सीमाओं का समालोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

मुख्य शब्द: आर्य समाज, आधुनिकीकरण, सामाजिक परिवर्तन, समाजशास्त्र, स्वामी दयानन्द सरस्वती, महिला शिक्षा, महिला संघर्ष, सामाजिक सुधार, जातिगत समानता, शुद्धि आंदोलन, सती प्रथा, बाल विवाह।

Keywords
Article Information
Volume

1

Year

2018

Review Rounds

1

Article Type

Research Article

Indexed In
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